जाने सावन के महीने में खाये जाने वाली घेवर मिठाई से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में।
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सावन का महीना आ चूका है और बरसात को भी अपने साथ लाया है। यूं तो बरसात के मौसम में चाय पकौडे खाना सबको पसंद होता है। लेकिन सावन के इस पर्व पर सिर्फ पकौडे नहीं मिठाइयों का भी महत्व बढ़ जाता है। हिन्दू धर्म की बात करें तो त्योहारों के दौरान मिठाइयों का महत्व कई गुना अधिक बढ़ जाता है। आज हम बात करेंगे ऐसी एक मिठाई के बारे में जिसे सावन के इस पर्व पर खूब पसंद किया जाता है और इस मिठाई का नाम है घेवर। राजस्थान और ब्रज क्षेत्र में सावन की शुरुआत के साथ ही हर घर से आने वाली घेवर की सुगंधित खुसबू आपको इसका आनंद लेने को मजबूर कर देती है। राजस्थान और ब्रज क्षेत्र में घेवर के बिना सावन की कल्पना करना लगभग नामुमकिन-सा है। आइये जानते हैं सावन के पावन पर्व में बनने वाली लोकप्रिय मिठाई घेवर से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में।

सावन घेवर मिठाई
courtesy google

सावन में लोकप्रिय है घेवर मिठाई –

जैसा कि हमने आपको बताया कि हिन्दू धर्म में कोई भी त्यौहार बिना मिठाइयों के पूरा नहीं होता। इसलिए मिठाइयों का त्योहारों के दौरान और भी महत्व बढ़ जाता है। घेवर कि बात करें तो प्राचीन समय से ही रक्षाबंधन और तीज के पर्व पर इसे शगुन के रूप में रखा जाता है। यदि आप राजस्थान, ब्रज या इसके आसपास के क्षेत्र से हैं, तो घेवर के बिना रक्षाबंधन और तीज का त्योहार अधूरा ही रह जाता है। प्राचीन काल से ही सावन के पवित्र माह में रक्षाबंधन पर बहन घेवर से बनी मिठाई लेकर भाई के घर जाती है। बिना घेवर के भाई-बहन का ये त्योहार पूरा नहीं माना जाता है।

घेवर का इतिहास –

अपने स्वाद के लिए मशहूर घेवर का इतिहास भी काफी प्राचीन है। मुख्यतः इसे राजस्थान और ब्रज क्षेत्रों की प्रमुख पारंपरिक मिठाई माना जाता है। घेवर की जन्म स्थली मुख्यतः राजस्थान मानी जाती है। लेकिन राजस्थान के अलावा इसके आस पास के क्षेत्रों और ब्रज में भी इस मिठाई का प्रचलन लोकप्रिय है। घेवर को पारंपरिक तरीके से घर पर भी बनाया जा सकता है। इसके अलावा आप चाहे तो इसे नजदीकी बाजार से भी खरीद सकते हैं। घेवर को अंग्रजी भाषा में हनीकॉम्ब डेटर्ट (Honeycomb Dessert) के नाम से जाना जाता है।

जानिए आयुर्वेद के अनुसार सावन के महीने में कौन सी चीजें नहीं खानी चाहिए।

घेवर से जुड़े कुछ रोचक तथ्य –

  • घेवर को पारम्परिक तरीके से तैयार करने के लिए मैदा और अरारोट के घोल को अलग-अलग आकृति के सांचों में डालकर तैयार किया जाता है। जिसे बाद में चासनी में डुबाया जाता है।
  • बदलते समय के साथ इस मिठाई की रेसिपी पर कई तरह एक्सपेरिमेंट्स हुए हैं। इन्ही का नतीजा है कि अब आपको मावा घेवर, मलाई घेवर और पनीर घेवर जैसे फ्लेवर में भी यह उपलब्ध हो जाती है।
  • बदलते समय के साथ घेवर के न सिर्फ स्वाद और रंग रूप में परिवर्तन हुआ बल्कि इसे दामों में भी काफी परिवर्तन देखने को मिला है। आज घेवर आपको 50 रूपये से लेकर 500 रूपये तक बिकता हुआ मिल जाता है।
  • रेट के इस अंतर के लिए जिम्मेदार बढ़ती हुए महँगाई से लेकर इसे बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री है। जहाँ सामान्य तरीके से बना घेवर सस्ता, तो वहीं काजू, बादाम और पिस्ता जैसे अन्य ड्रायफ्रूट्स को डालकर बनाया गया घेवर महंगे दामों पर बिकता है।
  • घेवर दो प्रकार का होता है, फीका और मीठा, जहाँ ताजा घेवर नर्म और खस्ता होता है लेकिन यह ज्यादा दिनों तक रखने से सख्त होने लगता है।
  • सख्‍त पड़ गए घेवर के को बेसन में मिलाकर तेल में तलकर पकौड़े बनाए जाते हैं। वहीं मीठे घेवर से खीर या पुडिंग भी बनाई जा सकती है।

सावधान! बरसात का मौसम हो चूका शुरू, खाने पीने का रखें विशेष ध्यान।

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